न ख़ुदा की न तो ख़ुदाई की
फ़िक्र हमको है ईएमआई की
बेपढ़े लिख रहे नसीब अपना
क्या इसी के लिए पढ़ाई की
चुप था जब चापलूस बोल रहे
मैंने इस तरहा लब-कुशाई* की
*बोलने के लिए होंठ खोलना
बिक गए ताज लुट गए क़िलए
हम फ़क़ीरों ने जब गदाई* की
*भिक्षा-वृत्ति
अपना ही ग...
फ़िक्र हमको है ईएमआई की
बेपढ़े लिख रहे नसीब अपना
क्या इसी के लिए पढ़ाई की
चुप था जब चापलूस बोल रहे
मैंने इस तरहा लब-कुशाई* की
*बोलने के लिए होंठ खोलना
बिक गए ताज लुट गए क़िलए
हम फ़क़ीरों ने जब गदाई* की
*भिक्षा-वृत्ति
अपना ही ग...