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हिन्दीकुंज,Hindi Website/Literary Web Patrika

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Publisher:  Unclaimed!
Message frequency:  3.53 / day

Message History

दो खिड़कियों के बीचनिश्चल, दफ़्तर की कुर्सी पर जड़वत बैठा,उदास, ऊबा, थका हुआ,क्षणों की लहरें गिनता हुआ चूर हो रहा हूँ।सांत्वना खोजती आँखें ऊपर उठती हैं,ऊपरी खिड़की को भेदती हुई,पर वहाँ बस एक नारियल-वृक्ष का बिखरा सिर,सूखा, झुलसा दृश्य,जो आँखों को और भी प्यासा कर देता है।पास कहीं समुद्र-गर्जन का आभास,भयावह बड़बड़ाहट-सी ध्वनि।डरी हुई आँखें फिर नीचे की खिड़की पर गिरती हैं,मानो वहीं...

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छद्म भेषधारीछद्म भेष धारियो ने लूट लिया राम का धन,  गेरुआ ओढ़ के बैठे, पर मन में है पाप का कन । तिलक माथे धोखा है, माला में है छल का जाल,  राम नाम की आड़ में कर रहे काला कारोबार बेहाल।पकड़ में है सभी नहीं, कुछ गुरुघंटा संग खड़े,  जिनके इशारे पर सब लुटेरे, सिंहासन पर जाकर अड़े। माल गया जहाँ लूट का, वहाँ रामद्रोही भी दंग रह गए, इतना बड़...

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संपादक के प्रति समर्पणबार-बार रचना पत्रिका के संपादक जी को भेजते-भेजते थक गये हैं।अगर पत्रिका में जगह नहीं मिली।इसका सीधा सरल उपाय है कि संपादक जी की शरणागत में नहीं पहुंच पाये।एक समर्पण का अभाव है।जी हुजूरी करने में आप सक्षम नहीं हैं। जिसके अभाव में साहित्यिक भाव न पैदा होने पर संपादक जी का आपकी रचना से मोहभंग हो जाता है।संपादक जी का हृदय जीतने का सहीं उपाय है। कुछ उनकी दानपेटि...

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माया ही मां हैमुझे इस चीज का एहसास उस दिन हुआ जब मैंने पहली बार मां महामाया के राधा-लक्ष्मी रूप को देखा, उन्होंने मुझे अपना साक्षात्कार कराया, या जब मैंने उनको अपनी अल्पना में बनाया। मैंने पहली बार कृष्ण के साथ मां को भी भोजन कराया, मैं हमेशा कोशिश करता हूँ कि कृष्ण को खिलाने के बाद ही खाऊँ, पर कभी मैं ऐसे लोगों के सामने होता हूँ जो मुझे ऐसा करता देख टोक देंगे तो मैं वहाँ ऐसा नह...

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मिथक से यथार्थ तक : महेश सांख्यधर की नाट्य-दृष्टिएक शीर्षक जिसने ठिठका दिया - महेश सांख्यधर व्यंग्य साहित्य के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम हैं। वे अपनी रचनाओं के माध्यम से समकालीन समाज की विसंगतियों और विडंबनाओं पर तीखा व्यंग्य करते हैं। वे ऊँच-नीच, अमीर-गरीब जैसे सामाजिक भेदभाव का विरोध करते हैं। साथ ही, अंधविश्वास और उन सामाजिक तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर भी प्रश्नचिह्न लगा...

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