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पंत और पल्लव की आलोचनात्मक समीक्षा | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'पंत और पल्लव, निराला जी की प्रसिद्ध आलोचनात्मक कृति है जिसे उन्होंने प्रारम्भ में 'प्रबन्ध पद्म' में निबन्ध रूप में संकलित किया था । कालान्तर में निराला जी की साहित्यिक मान्यताओं के संवाहक के रूप में इसके स्वतन्त्र प्रकाशन की आवश्यकता अनुभव की गई है । इस लघुकाय कृति में उन्होंने पंत जी द्वारा 'पल्लव' की भूमिका में व...

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हे वीर हृदय हे धीर हृदयहे वीर हृदय, हे धीर हृदय, उठो ज्वाला बनकर दहको,  सीमा पर लहरें लहू की, शौर्य की मशालें बन महको।शेर की दहाड़ है साँसों में, बाजू में वज्र की ताकत, मातृभूमि की माटी बोले, अब और नहीं सहना अब।रणभेरी गूंजे नभ में, कायरता की नींदें टूटें, दुश्मन की आँखों में तूफां, हर वार से किले लूटें।रक्त से लिखी है गाथा, इतिहास गवाह बनेगा, जो शीश चढ़ा

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थोथा चना बाजे घनाएक लेखक मेरे एक साहित्यिक कथन पर उनकी आत्मा फट गयी। आंखें बड़ी-बड़ी हो गयी। हेय दृष्टि से देखने लगे। कसाई जैसे बलि के बकरे को देखता है वैसी ही तीक्ष्ण दृष्टि हमारे उपर उनकी थी। मुझे हलाल करने की पूरी नीति अपना डाली। मैं भौचक्का होकर देखकर रहा था। मेरा मन भी चुलबुलाता रहता है इसलिए फेसबुक पर लिख देता हूँ। अब वे अपना हिंदी के प्रति संपूर्ण समर्पण दिखाते नजर आये। ह...

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भीतर का उजालाअकेलेपन की रात में,जब चाँद भी छुपा-सा लगे,ज़िम्मेदारियों की बोझिल राहेंकभी-कभी टूटन जैसी लगें।तब तुम्हारे शब्दपहली सुबह की रौशनी बनकर आए,और थके हुए दिल मेंउम्मीद के दीप जलाए।हर दर्द, हर ख़ामोशीतुम्हारी मुस्कान में पिघलने लगी,और रूह कोफिर से जीने की वजह मिलने लगी।जो बिखरा हुआ थाभीतर कहीं,वह धीरे-धीरेख़ुद में सिमटने लगा।तुम्हारे शब्दउसके दिल की आवाज़ बन गए,उसकी ख़ामोश...

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यूनिवर्सिटी तक क्यों नहीं पहुंच पाती हैं गांव की लड़कियां?राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में लड़कियों की शिक्षा की तस्वीर पिछले कुछ वर्षों में बदली है, लेकिन यह बदलाव अभी उस मुकाम तक नहीं पहुंचा है जहां हर किशोरी के लिए 12वीं के बाद की पढ़ाई स्वाभाविक रूप से उसका अगला कदम बन सके। सरकार की विभिन्न योजनाओं के कारण प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं तक पहुंचती लड़कियों की संख्या बढ़ी ज़रूर है...

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