Please turn JavaScript on

हिन्दीकुंज,Hindi Website/Literary Web Patrika

Following हिन्दीकुंज,Hindi Website/Literary Web Patrika's news feed is very easy. Subscribe using the "follow" button on the top right and if you want to, choose the updates by topic or tag.

We will deliver them to your inbox, your phone, or you can use follow.it like your own online RSS reader. You can unsubscribe whenever you want with one click.

Keep up to date with हिन्दीकुंज,Hindi Website/Literary Web Patrika!

हिन्दीकुंज,Hindi Website/Literary Web Patrika: हिन्दीकुंज,Hindi Website/Literary Web Patrika

Is this your feed? Claim it!

Publisher:  Unclaimed!
Message frequency:  2.88 / day

Message History

महिलाओं के श्रम को आर्थिक पहचान देने की ज़रूरत हैराजस्थान के ग्रामीण इलाकों में सुबह से शाम तक महिलाएं अपने काम में जुटी रहती हैं। कोई घर के काम निपटाने के बाद पापड़ और अचार बनाने बैठती है, तो कोई खेतों में बुवाई, निराई और कटाई करती है। कई महिलाएं पशुपालन के साथ-साथ मनरेगा के तहत सड़क निर्माण, तालाब की खुदाई, सफाई, पौधारोपण और खेतों की मेड़ बनाने जैसे कामों में पुरुषों के साथ कं...

Read full story
शांत रहो, पाप!एक गालीआकर होंठों पर ठिठक जाती है;व्यर्थ हो जाती हैंमन को लालिमा से भर देने वालीवे तमाम संध्याएँ!आँखों में जलता है आक्रोश;तिरस्कार सहज हो उठता है!निष्फल हो जाती हैंहृदय को शीतलता देने वालीवे तमाम उषाकालीन वेलाएँ!केवल प्रहार करने कोमचलते हैं हाथ;व्यर्थ हो जाती हैंमेधा के स्रोत से फूटीकरुणा की सरिताएँ!जिस सीने मेंहत्या की उत्कंठा पलती है,उसी में प्रेम खिल उठता है;आसक...

Read full story
दिवाली की आहट | बचपन के आँगन से आज की कृतज्ञता तकदिवाली का त्योहार आते ही मुझे सबसे पहले अपना बचपन याद आता है। दिवाली में सबसे ज़्यादा मज़ा बच्चों को ही आता है। वे पूरे साल उसका इंतज़ार करते हैं, जैसे हम किया करते थे। हमारे बचपन में दिवाली आने का पता कैलेंडर से नहीं, सर्दियों की शुरुआत और हवा में आने वाली हल्की ठंडक से लग जाता था। फिर शुरू होती थीं घर और आँगन की तैयारियाँ।आँगन क...

Read full story
एक उलझनशब्दों में फँसकर ख़ुद में उलझना,ज़िंदगी सँवारने में फिर से ख़ुद से बिछड़ना।कल के बचपन को फिर से जीना,जवानी के साथ थोड़ा और बदलना।न जाने कहाँ ले चला ये आलम,समझाने की चाह में नासमझ कर गया।अपनी ज़िंदगी को यूँ ही बनाए रखना,हर किसी जैसा होकर भी ख़ुद-सा रहना।मन की जुस्तजू में न जाने कैसी कश्मकश है,जीना चाहते हैं बचपना, जी जा रही है जवानी।- वेदिका गुरव,तहसील भैंसदेही, जिला बैतूल...

Read full story
तेरे नाम की शाम करूँतेरी हँसी में सुबह मिले,तेरी नज़र में शाम करूँ,तू जो मिले तो ज़िंदगी को,हर पल तेरे नाम करूँ।आ जा ज़रा, मेरे करीब आ,कुछ अनकही सी बात करूँ,तू मेरी धड़कनों में रहे,मैं तुझसे ही शुरुआत करूँ।चुपके से जब हवा चले,तेरा ही एहसास आए,भीगी हुई इन पलकों पर,तेरा ही ख़्वाब मुस्काए।राहों में तेरी आहट हो,साँसों में तेरा सुर रहे,मैं जिस तरफ़ भी देखूँ सनम,चेहरा तेरा नज़र रहे।तू...

Read full story